नारियल के पत्ते से ग्रामीण महिलाएं बना रही हैं स्ट्रॉ

अक्सर जूस या कोल्ड ड्रिंक पीने के लिए लोग स्ट्रॉ का प्रयोग करते हैं, लेकिन अब यही स्ट्रॉ ग्रामीण महिलाओं को न सिर्फ आत्मनिर्भर बना रहा है बल्कि यह ‘वोकल फॉर लोकल’ ग्लोबल स्तर की मिसाल बन चुका है। महिलाएं प्लास्टिक की जगह नारियल के पत्ते से इकोफ्रेंडली स्ट्रॉ बना रही हैं।

दरअसल, हुआ कुछ यूं कि कॉलेज के कैंपस में टहलते हुए एक दिन प्रोफेसर साजी वर्गिस की नजर नारियल पेड़ के सूखे पत्तों पर पड़ी तो उन्होंने इन पत्तों को जलाने या कचरे के ढेर बनाने की बजाय इसका यह इस्तेमाल करने का सोचा। कई दिनों तक काफी सोचने के बाद प्रोफेसर ने अपने कॉलेज के छात्रों के साथ मिलकर स्ट्रॉ बनाने की तकनीक विकसित कर ली।

छोटी मशीन के जरिए नारियल के सूखे पत्तों को तराश कर स्ट्रॉ बनाना शुरू किया गया। प्रोफेसर साजी का मकसद साफ था कि तटीय इलाकों में रहने वाली ग्रामीण महिलाओं को इससे रोजगार प्रदान किया जा सकता है।

मदुरई, कासल गोड़ और टिटकड़ी में उन्होंने इन मशीन को लगाकर काम शुरू किया। यहां की ग्रामीण महिलाओं को प्रशिक्षण देने के बाद स्ट्रॉ बनाना सिखा दिया और आज उनके पास 25 लाख से ज्यादा स्ट्रॉ बनाने के ऑर्डर हैं।

हर साल एक नारियल का पेड़ स्वाभाविक रूप से अपने छह पत्ते खो देता है। उन पत्तों को ग्रामीण इलाकों में अधिकांश रूप से जलाया जाता है। लेकिन, अब महिलाएं नारियल के पत्ते से स्ट्रॉ बना रही हैं। महिलाओं को इससे रोजगार भी मिला है, जिससे वह अपना घर चला रही हैं।

साल 2020 में स्टार्टअप लॉन्च पैड में उन्हें इसके लिए अवार्ड भी मिला है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी इस पहल की सराहना भी की गई है। कोविड के बाद बदलते आर्थिक हालात ने प्रो. साजी वर्गिस इस प्रोजेक्ट के जरिए लोगों को रोजगार देने की योजना बना चुके हैं और हर साल एक हजार ग्रामीण महिलाओं के लिए विशेष रोजगार के अवसर तैयार कर रहे हैं। खास बात यह है कि नारियल से बने ये स्ट्रॉ प्लास्टिक की स्ट्रॉ की जगह ले रहे हैं।